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ललित जैन, राणापुर
मध्य प्रदेश के जनजातीय कार्य विभाग (ट्राईबल वेलफेयर) के शिक्षकों पर शिक्षक पात्रता परीक्षा (TET) की अनिवार्यता के कारण उपजे गंभीर संकट को लेकर ‘मप्र ट्राईबल वेलफेयर टीचर्स एसोसिएशन’ ने दिल्ली में मोर्चा खोल दिया है। राज्यसभा सांसद डॉ. सुमेर सिंह सोलंकी के नेतृत्व में एसोसिएशन के प्रतिनिधिमंडल ने संसद भवन पहुंचकर कई केंद्रीय मंत्रियों और सांसदों से मुलाकात की और उन्हें एक विस्तृत ज्ञापन सौंपा।
क्या है पूरा मामला?
सुप्रीम कोर्ट द्वारा 1 सितंबर 2025 को दिए गए एक निर्णय के बाद, वर्ष 2011 से पूर्व नियुक्त शिक्षकों के लिए भी TET उत्तीर्ण करना अनिवार्य कर दिया गया है। इस फैसले से अकेले झाबुआ जिले के लगभग चार हजार और पूरे प्रदेश के हजारों शिक्षकों के सामने ‘सेवा समाप्ति’ का डर पैदा हो गया है। शिक्षकों का तर्क है कि वर्षों की सेवा के बाद इस उम्र में परीक्षा की अनिवार्यता एक गंभीर मानवीय संकट है।
दिग्गज नेताओं से मिले शिक्षक प्रतिनिधि
एसोसिएशन के प्रदेश अध्यक्ष डी.के. सिंगौर और महासचिव मनीष पंवार (झाबुआ) के नेतृत्व में दल ने दिल्ली में कई महत्वपूर्ण हस्तियों से चर्चा की:
कानूनी विशेषज्ञ और सांसद: प्रसिद्ध अधिवक्ता उज्ज्वल निकम और विवेक तन्खा से कानूनी पहलुओं पर चर्चा हुई।
केंद्रीय नेतृत्व: केंद्रीय मंत्री डॉ. वीरेंद्र कुमार खटीक और फग्गन सिंह कुलस्ते को स्थिति से अवगत कराया गया।
सांसद गण: राज्यसभा सांसद पी.टी. उषा, अरुण गोविल, जयराम रमेश सहित मध्य प्रदेश के विभिन्न क्षेत्रों के सांसदों (इंदौर, देवास, उज्जैन, जबलपुर आदि) को ज्ञापन दिया गया।
चूंकि केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान कोलकाता प्रवास पर थे, प्रतिनिधिमंडल बुधवार को उनसे भेंट कर शिक्षकों का पक्ष रखेगा।
न्यायालय में ‘पुनर्विचार याचिका’ की तैयारी
संगठन के मीडिया प्रभारी इरफान मंसूरी ने बताया कि शिक्षक संगठन न केवल राजनीतिक स्तर पर प्रयास कर रहा है, बल्कि कानूनी लड़ाई के लिए भी तैयार है। एसोसिएशन सर्वोच्च न्यायालय में पुनर्विचार याचिका (Review Petition) दाखिल करने जा रहा है। शिक्षकों की मांग है कि मध्य प्रदेश की भौगोलिक और जमीनी स्थिति अन्य राज्यों से भिन्न है, अतः नियमों में शिथिलता दी जाए।
शिक्षकों में आक्रोश और भय
प्रतिनिधिमंडल के सदस्यों—सु्रेश यादव, हेमेन्द्र मालवीय, नीलेश भावसार और अन्य—का कहना है कि यदि सरकार और न्यायालय ने इस दिशा में सहानुभूतिपूर्वक विचार नहीं किया, तो हजारों परिवारों के सामने रोजी-रोटी का संकट खड़ा हो जाएगा।
