जो भाग्य लिख सकता हे वह मिटा भी सकता है : आचार्य जैमिन जी छायन में बह रही धर्म की गंगा

ललित जैन राणापुर

श्रीमद् भागवत कथा, छायन राणापुर में आचार्य जैमिन जी के मुखारबिंद से आज तृतीय दिवस की कथा अंतर्गत आचार्यजी ने जय एवं विजय (भगवान ने द्वारपाल ) का वैकुंठ से सनतकुमार के शाप द्वारा पतन की कथा तथा देवहूति एवं कर्दम की तपस्या और भगवान कपिल मुनि के जन्म की कथा का वर्णन किया । साथ ही आचार्य जी ने भगवान कपिल द्वारा देवहूति को भक्ति योग का , अष्टांग योग का उपदेश दिया इत्यादि कथा का रसपान कराया गया । साथ ही में मनु एवं शतरूपा की तीन पुत्री १ ) आकूति २) देवहूति एवं ३) प्रसूति इन तीन कन्याओं में से प्रसूति का विवाह दक्ष प्रजापति के साथ हुवा एवं उनके वंश की कथा सुनाई । दक्ष के तहा भवानी सती का प्राकट्य हुआ एवं देवाधिदेव भगवान महादेव के साथ विवाह हुआ तथा सती ने देहत्याग किया एवं वीरभद्र की उत्पत्ति की कथा एवं वीरभद्र द्वारा दक्ष के यज्ञ के विध्वंस की कथा सुनाई । साथ में ही आचार्यजी ने मनु एवं शतरूपा के पुत्र उत्तानपाद के पुत्र परम भक्त ध्रुव जी की कथा एवं ध्रुव जी के वंश का भी वर्णन किया, अन्य अनेक दृष्टांत द्वारा कृष्ण कथा का वर्णन कराया गया ।साथ ही आचार्य जी बताया कि
भगवद गीता में तीन प्रकार की भक्ति ना निरूपण है
१. सतोगुण युक्त भक्त
. २. रजोगुण युक्त भक्ति
३. तमोगुण युक्त भक्ति ।
इन तीनो भक्ति में सतोगुण भक्ति ही श्रेष्ठ है । सतोगुण युक्त भक्ति का अर्थ ही कामना रहित भक्ति । जब हम भगवान की भक्ति करते हैं जिसमें किसीभी प्रकार को कामना नहीं होती हैं तो उसे सतोगुणी भक्ति कहा जाता ही है । रजोगुण भक्ति का अर्थ है किसी प्रकार के फल की आशा रख कर आराधना करना । तमोगुणी भक्ति अर्थ है किसी और के प्रति बुरा भाव रख कर उसका अनिष्ट करने के भाव से भाटी करना । इन तीनो प्रकार की भक्ति में सतोगुणी भक्ति को भगवान ने उत्तम कहा है, रजोगुण युक्त भक्ति को माध्यम कहा है एवं तामसिक भक्ति को अधम माना गया है इस लिए हमेशा निष्काम भाव से निरंतर आराधना करते रहिए श्री हरि आपको जरूर मिलेंगे ।

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